Sunday, 29 March 2026
कामदा एकादशी व्रत कथा
कामदा एकादशी व्रत कथा |
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में बताने की प्रार्थना की. तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि चैत्र शुक्ल एकादशी व्रत को कामदा एकादशी कहते हैं. इस व्रत को करने से पाप से मुक्ति मिलती है. इस एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है—
प्राचीन काल में एक भोगीपुर राज्य था, जिसका राजा पुंडरीक था. वह धन एवं ऐश्वर्य से युक्त था. उसके ही राज्य में ललित और ललिता नाम के स्त्री और पुरुष रहते थे. दोनों एक दूसरे से बेहद प्रेम करते थे. एक बार राजा पुंडरीक की सभा में ललित अन्य कलाकारों के साथ गाना गा रहा था, उसी दौरान ललिता को देखकर उसका ध्यान भंग हो गया और वह स्वर बिगड़ गया.
सभा में उपस्थित सेवकों ने राजा पुंडरीक को इस बात की जानकारी दे दी. इस पर क्रोधित राजा पुंडरीक ने ललित को राक्षस होने का श्राप दे दिया. श्राप के कारण ललित राक्षस बन गया और उसका शरीर 8 योजन का हो गया. अब वह जंगल में रहने लगा. पत्नी ललिता जंगल में ललित के पीछे भागती रहती थी. राक्षस होने के कारण ललित का जीवन बड़ा कष्टमय हो गया था.
एक रोज ललिता विंध्याचल पर्वत पर गई. वहां पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था. ललिता ने श्रृंगी ऋषि को प्रणाम किया और अपने आने को उद्देश्य बताया. श्रृंगी ऋषि ने कहा कि तुम परेशान ना हो. तुम कामदा एकादशी का व्रत रखो और उस व्रत से अर्जित पुण्य फल को अपने पति को समर्पित कर दो. उस व्रत के पुण्य प्रभाव से तुम्हारा पति राक्षस योनि से बाहर निकल आएगा.
अगले बरस जब चैत्र शुक्ल एकादशी का व्रत आया तो ललिता ने श्रृंगी ऋषि द्वारा बताए गए नियम से कामदा एकादशी का व्रत किया और भगवान विष्णु की आराधना की. पूरे दिन कुछ नहीं खाया. रात्रि के समय में जागरण की. फिर अगले दिन पारण किया और भगवान विष्णु से इस व्रत के पुण्य को पति ललित को देने की प्रार्थना की. उसने कहा कि वह कामदा एकादशी के पुण्य को आने पति को देती है, ताकि वह राक्षस योनि से मुक्त हो जाएं. श्रीहरि की कृपा से ललित राक्षस योनि से मुक्त हो गया. फिर से दोनों साथ में रहने लगे. एक दिन स्वर्ग से विमान आया और वे दोनों उस पर बैठकर स्वर्ग चले गए 1
Friday, 9 February 2024
Ma kali 10 vidya mantra
👇🏻👇🏻
1.मां काली -‘क्रीं ह्रीं काली ह्रीं क्रीं स्वाहा’
2.मां तारा -‘ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट’
3.मां त्रिपुरसुंदरी -‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीये नम:’
4.मां भुवनेश्वरी-‘ह्रीं भुवनेश्वरीय ह्रीं नम’
5.मां छिन्न्मस्ता की पूजा-‘श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैररोचनिए हूं हूं फट स्वाहा’
6.मां त्रिपुर भैरवी -‘ॐ ह्रीं भैरवी क्लौं ह्रीं स्वाहा’
7.मां धूमावती-‘धूं धूं धूमावती दैव्ये स्वाहा’
8. मां बगलामुखी-ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं, पदम् स्तम्भय जिव्हा कीलय, शत्रु बुद्धिं विनाशाय ह्रलीं ॐ स्वाहा’
9.मां मातंगी -क्रीं ह्रीं मातंगी ह्रीं क्रीं स्वाहा
10.मां कमला -‘क्रीं ह्रीं कमला ह्रीं क्रीं स्वाहा’
Thursday, 7 December 2023
उत्पन्ना एकादशी
मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी से भगवान विष्णु के निमित्त उत्पन्न होने वाली एकादशी का व्रत किया जाता है।
विस्तार
मार्गदर्शक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत भगवान विष्णु के निमित्त ब्रह्मा पक्ष की ओर से किया जाता है। तृतीया तिथि प्रारंभ 8 दिसंबर प्रातः 05 बजकर 06 मिनट पर हो रही है। इसका समापन 9 दिसंबर प्रातः 06 बजे 31 मिनट पर होगा। ऐसे में ब्रह्माण्ड ब्रह्माण्ड का व्रत 8 दिसंबर को
महत्वपूर्ण
चतुर्थी के अनुसार रखा जाता है जो मनुष्य ब्रह्माण्ड ब्रह्माण्ड का व्रत करता है। वह वैकुंठधाम में जहां साक्षात गरुणध्वज मंदिर हैं,जाता हैं। जो मनुष्य ब्रह्माण्ड महात्म्य का पाठ करता है, उसे सहस्त्र गोदान के पुण्य का फल प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है। सिद्धांत है कि इस व्रत के मिलन वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तप, तीर्थों में स्नान-दान आदि से मिलने वाले फल भी अधिक होते हैं।
पूजा विधि
इस दिन देवी ब्रह्माण्ड सहित भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करने का विधान है। इस दिन ब्रह्मा उत्सव के समय भगवान का पुष्प, धूप, दीप, चंदन, अक्षत, फल, तुलसी आदि से पूजन करना चाहिए। इस व्रत में केवल फलाहार का ही भोग लगाया जाता है।' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना अति उत्तम रहता है। साईं के समय देवालय में दीपदान करने से पुण्य फलों की वृद्धि होती है। श्री विष्णु कृपा के लिए रात्रि में भजन-कीर्तन आदि प्राप्त करें।
पौराणिक कथा
सतयुग में एक महाभयंकर दैत्यमुर ने इंद्र देवताओं पर विजय प्राप्त की थी, उन्हें उनके स्थान से अलग कर दिया गया था। तब इंद्र और अन्य देवता क्षीरसागर में भगवान श्री विष्णु के पास गए। श्रीविष्णु जी ने सभी राजाओं को राजा और विनती की मुक्ति की स्थापना की। इंद्र आदि देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान श्रीविष्णु बोले-देवों में शत्रु का शीघ्र ही वध होगा। जब देवताओं ने श्री विष्णु जी को भूमि पर युद्ध करते देखा तो उन पर अस्त्र-शास्त्रों का प्रहार करने लगे। श्रीविष्णु मुर भगवान को मारने के लिए उनके सभी तेज से विनाश के उपाय करें। श्रीविष्णु उस दैत्य के साथ सहस्त्र वर्षों तक युद्ध करते रहे लेकिन उस दैत्य को न जीत सके। अंत में विष्णुजी शांति विश्राम की इच्छा से बद्रीकाश्रम में सिंहावती नाम की गुफा, जो बारह योजन लंबी थी, शयन करने के लिए चले गए। देवता भी उस गुफा में चले गए, कि आज मैं श्रीविष्णु को मार कर अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लूंगा। उस समय की गुफाओं में एक अत्यंत सुंदर उत्पन्न हुई कन्या और देवता के सामने ज्ञान युद्ध हुआ था। दोनों में देर रात तक युद्ध हुआ और उस कन्या ने राक्षस को चकमा घाट पर मौत के घाट उतार दिया और उस देवता के सिर को इस प्रकार काट दिया गया कि उसे देवता की मृत्यु प्राप्त हुई। उसी समय श्री हरि की निद्रा मैत्री, देवता को देखकर आश्चर्य हुआ और विचार करने लगे कि राम ने मारा। इस पर कन्या ने कहा कि जिस समय मेरे शरीर का निर्माण हुआ था, उसी समय हत्या की तैयारी हो गई थी। भगवान श्री विष्णु ने उस कन्या का नाम ब्रह्माण्ड बताया था।
Saturday, 7 October 2023
इंदिरा एकादशी
धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! आश्विन कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा फल क्या है? सो कृपा करके कहिए। भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह एकादशी पापों को नष्ट करने वाली तथा पितरों को अधोगति से मुक्ति देने वाली होती है। हे राजन! ध्यानपूर्वक इसकी कथा सुनो। इसके सुनने मात्र से ही वायपेय यज्ञ का फल मिलता है।
प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था। वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और विष्णु का परम भक्त था। एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया।
सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहाँ यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो।
मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा। उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूँ। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूँ, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है।
इतना सुनकर राजा कहने लगा कि हे महर्षि आप इस व्रत की विधि मुझसे कहिए। नारदजी कहने लगे- आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करता हुआ प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूँगा।
हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए, इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएँ और दक्षिणा दें। पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूँघकर गौ को दें तथा ध़ूप, दीप, गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से ऋषिकेश भगवान का पूजन करें।
रात में भगवान के निकट जागरण करें। इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी मौन होकर भोजन करें। नारदजी कहने लगे कि हे राजन! इस विधि से यदि तुम आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएँगे। इतना कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गए।
नारदजी के कथनानुसार राजा द्वारा अपने बाँधवों तथा दासों सहित व्रत करने से आकाश से पुष्पवर्षा हुई और उस राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गया। राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर स्वर्गलोक को गया। हे युधिष्ठिर! यह इंदिरा एकादशी के व्रत का माहात्म्य मैंने तुमसे कहा।
Sunday, 24 September 2023
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
<भाद्रपद शुक्ल एकादशी की पौराणिक कथा
युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद
शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। तब
भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों
का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूं तुम
ध्यानपूर्वक सुनो।
यह पद्मा/परिवर्तिनी एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका
यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे
बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है,
उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को
अवश्य करें।
जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते
हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित
तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस
दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।
भगवान के वचन
सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और
करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएं
कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या
कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए।
श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप
सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें। त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य
था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था
और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष
के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया।
इस कारण सभी देवता एकत्र होकर
सोच-विचारकर भगवान के पास गए। बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और
नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे। अत: मैंने वामन
रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत
लिया।
इतनी वार्ता सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन! आपने वामन रूप धारण
करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता? श्रीकृष्ण कहने लगे- मैंने (वामन रूपधारी
ब्रह्मचारी) बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा- ये मुझको तीन लोक के समान
है और हे राजन यह तुमको अवश्य ही देनी होगी।
राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन
पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहां तक
कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में
हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया।
सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र, इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब
नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की। तब मैंने राजा बलि का हाथ
पकड़कर कहा कि हे राजन! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए। अब तीसरा
पग कहां रखूं?
तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख
दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया। फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर
मैंने कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूंगा। विरोचन पुत्र बलि से कहने
पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई।
इसी
प्रकार दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग के पष्ठ पर हुई! हे राजन! इस एकादशी को भगवान
शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन
पूजन करना चाहिए।
इस दिन तांबा, चांदी, चावल और दही का दान करना उचित है। रात्रि को
जागरण अवश्य करना चाहिए।
जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से
मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो
पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता
है।
Wednesday, 29 April 2020
चित्रगुप्त भगवान् की आरती-
जय चित्रगुप्त यमेश तव, शरणागतम् शरणागतम्।
जय पूज्यपद पद्मेश तव, शरणागतम् शरणागतम्॥
जय देव देव दयानिधे, जय दीनबन्धु कृपानिधे।
कर्मेश जय धर्मेश तव, शरणागतम् शरणागतम्॥
जय चित्र अवतारी प्रभो, जय लेखनीधारी विभो।
जय श्यामतम, चित्रेश तव, शरणागतम् शरणागतम्॥
पुर्वज व भगवत अंश जय, कास्यथ कुल, अवतंश जय।
जय शक्ति, बुद्धि विशेष तव, शरणागतम् शरणागतम्॥
जय विज्ञ क्षत्रिय धर्म के, ज्ञाता शुभाशुभ कर्म के।
जय शांति न्यायाधीश तव, शरणागतम् शरणागतम्॥
जय दीन अनुरागी हरी, चाहें दया दृष्टि तेरी।
कीजै कृपा करूणेश तव, शरणागतम् शरणागतम्॥
तब नाथ नाम प्रताप से, छुट जायें भव, त्रयताप से।
हो दूर सर्व कलेश तव, शरणागतम् शरणागतम्॥
जय चित्रगुप्त यमेश तव, शरणागतम् शरणागतम्।
जय पूज्य पद पद्येश तव, शरणागतम् शरणागतम्
भगवान चित्रगुप्त प्राकट्योत्सव की बधाई।
श्री चित्रगुप्त पूजन विधि (सरलतम विधि )
श्री चित्रगुप्त पूजन विधि (सरलतम विधि )
पूजा स्थान को साफ़ कर एक चौकी पर कपड़ा विछा कर श्री चित्रगुप्त जी का फोटो स्थापित करें यदि चित्र उपलब्ध न हो तो कलश को प्रतीक मान कर चित्रगुप्त जी को स्थापित करें
दीपक जला कर गणपति जी को चन्दन ,हल्दी,रोली अक्षत ,दूब ,पुष्प व धूप अर्पित कर पूजा अर्चना करें |
श्री चित्रगुप्त जी को भी चन्दन ,हल्दी,रोली अक्षत ,पुष्प व धूप अर्पित कर पूजा अर्चना करें |
फल ,मिठाई और विशेष रूप से इस दिन के लिए बनाया गया पंचामृत (दूध ,घी कुचला अदरक ,गुड़ और गंगाजल )और पान सुपारी का भोग लगायें |
इसके बाद परिवार के सभी सदस्य अपनी किताब,कलम,दवात आदि की पूजा करें और चित्रगुप्त जी के समक्ष रक्खें |
अब परिवार के सभी सदस्य एक सफ़ेद कागज पर एप्पन (चावल का आंटा,हल्दी,घी, पानी )व रोली से स्वस्तिक बनायें |उसके नीचे पांच देवी देवतावों के नाम लिखें ,जैसे -श्री गणेश जी सहाय नमः ,श्री चित्रगुप्त जी सहाय नमः ,श्री सर्वदेवता सहाय नमः आदि |
इसके नीचे एक तरफ अपना नाम पता व दिनांक लिखें और दूसरी तरफ अपनी आय व्यय का विवरण दें ,इसके साथ ही अगले साल के लिए आवश्यक धन हेतु निवेदन करें |फिर अपने हस्ताक्षर करें |
इस कागज और अपनी कलम को हल्दी रोली अक्षत और मिठाई अर्पित कर पूजन करें |
अब श्री चित्रगुप्त जी का ध्यान करते हुए निम्न लिखित मंत्र का कम से कम ११ बार उच्चारण करें -
मसीभाजन संयुक्तश्चरसि त्वम् ! महीतले |
लेखनी कटिनीहस्त चित्रगुप्त नमोस्तुते ||
चित्रगुप्त ! मस्तुभ्यं लेखकाक्षरदायकं |
कायस्थजातिमासाद्य चित्रगुप्त ! नामोअस्तुते ||
अब सभी सदस्य श्री चित्रगुप्त जी की आरती गावें |
इसके पश्चात् ख़ुशी पूर्वक श्री चित्रगुप्त जी महराज और श्री गणेश जी महाराज से अपने और अपने लोगों के लिए मंगल आशीर्वाद प्राप्त करते हुए शीश झुकाएं एवं प्रसाद का वितरण करें |
श्री चित्रगुप्त जी की आरती -
जय चित्रगुप्त यमेश तव ,शरणागतम ,शरणागतम|
जय पूज्य पद पद्मेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
जय देव देव दयानिधे ,जय दीनबंधु कृपानिधे |
कर्मेश तव धर्मेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
जय चित्र अवतारी प्रभो ,जय लेखनीधारी विभो |
जय श्याम तन चित्रेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
पुरुषादि भगवत् अंश जय ,कायस्थ कुल अवतंश जय |
जय शक्ति बुद्धि विशेष तव शरणागतम ,शरणागतम||
जय विज्ञ मंत्री धर्म के ,ज्ञाता शुभाशुभ कर्म के |
जय शांतिमय न्यायेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
तव नाथ नाम प्रताप से ,छूट जाएँ भय त्रय ताप से |
हों दूर सर्व क्लेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
हों दीन अनुरागी हरि, चाहें दया दृष्टि तेरी |
कीजै कृपा करुणेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
वृहद् पूजन विधि -
इस विशेष पर्व पर श्री चित्रगुप्त जी महाराज एवं धर्मराज के पूजन से पहले पूजा स्थल पर कलश स्थापना (वरुण पूजन कर) वरुण देवता का आवाहन करें | फिर गणेश अम्बिका का पूजन कर उनका आवाहन करें | तत्पश्चात ईशान कोण में वेदी बनाकर नवग्रह की स्थापना कर आवाहन करें | इसके पश्चात् दवात,कलम,पत्र-पूजन एवं तलवार की स्थापना कर नीचे दी गयी विधि से पूजन करें |
पूजन एवं हवन सामग्री -
धूप, दीप, चन्दन, लाल फूल, हल्दी, रोली, अक्षत, दही, दूब, गंगाजल, घी, कपूर, कलम ( बिना चिरी हुई ), दवात, कागज, पान, सुपारी, गुड़, पांच फल, पांच मिठाई, पांच मेवा, लाई, चूड़ा, धान का लावा, हवन सामग्री एवं हवन के लिए लकड़ी आदि |
सामग्री पर पवित्र जल छिड़कते हुए प्रभु का स्मरण करें |
नमस्तेस्तु चित्रगुप्ते, यमपुरी सुरपूजिते |
लेखनी-मसिपात्र, हस्ते, चित्रगुप्त नमोस्तुते ||
स्वस्तिवाचन -
ॐ गणना त्वां गणपति हवामहे, प्रियाणां त्वां प्रियेपत्र हवामहे निधीनां त्वां निधिपते हवामहे वसो मम आहमजानि गर्भधामा त्वमजासि गर्भधम |
ॐ गणपत्यादि पंचदेवा नवग्रहाः इन्द्रादि दिग्पाला दुर्गादि महादेव्यः इहा गच्छत स्वकीयाम् पूजां ग्रहीत भगवतः चित्रगुप्त देवस्य पूजमं विघ्नरहित कुरूत |
ध्यान -
तच्छरी रान्महाबाहुः श्याम कमल लोचनः कम्वु ग्रीवोगूढ शिरः पूर्ण चन्द्र निभाननः ||
काल दण्डोस्तवोवसो हस्ते लेखनी पत्र संयुतः | निःमत्य दर्शनेतस्थौ ब्रह्मणोत्वयक्त जन्मनः ||
लेखनी खडगहस्ते च- मसि भाजन पुस्तकः | कायस्थ कुल उत्पन्न चित्रगुप्त नमो नमः ||
मसी भाजन संयुक्तश्चरोसि त्वं महीतले | लेखनी कठिन हस्ते चित्रगुप्त नमोस्तुते ||
चित्रगुप्त नमस्तुभ्यं लेखकाक्षर दायक | कायस्थ जाति मासाद्य चित्रगुप्त मनोस्तुते ||
योषात्वया लेखनस्य जीविकायेन निर्मित | तेषा च पालको यस्भात्रतः शान्ति प्रयच्छ मे ||
आवाहन-
हे!चित्रगुप्त जी मैं आपका आवाहन करता हूँ |
ॐ आगच्छ भगवन्देव स्थाने चात्र स्थिरौ भव | यावत्पूजं करिष्यामि तावत्वं सान्निधौ भव |
ॐ भगवन्तं श्री चित्रगुप्त आवाहयामि स्थापयामि ||
आसन-
ॐ इदमासनं समर्पयामि |
भगवते चित्रगुप्त देवाय नमः ||
पाद्य-
ॐ पादयोः पाद्यं समर्पयामि |
भगवते चित्रगुप्त देवाय नमः ||
आचमन-
ॐ मुखे आचमनीयं समर्पयामि |
भगवते चित्रगुप्ताय नमः ||
स्नान-
ॐ स्नानार्तः जलं समर्पयामि |
भगवते श्री चित्रगुप्ताय नमः ||
वस्त्र-
ॐ पवित्रों वस्त्रं समर्पयामि |
भगवते श्री चित्रगुप्त देवाय नमः ||
पुष्प-
ॐ पुष्पमालां च समर्पयामि |
भगवते श्री चित्रगुप्तदेवाय नमः ||
धूप-
ॐ धूपं माधापयामी |
भगवते श्री चित्रगुप्तदेवादीप-
ॐ दीपं दर्शयामि |
भगवते श्री चित्रगुप्त देवाय नमः II
नैवेद्य
ॐ नैवेद्यं समर्पयामि |
भगवते श्री चित्रगुप्त देवाय नमः ||
ताम्बूल-दक्षिणा
ॐ ताम्बूलं समर्पयामि
ॐ दक्षिणा समर्पयामि
भगवते श्री चित्रगुप्त देवाय नमः ||
दवात -लेखनी मंत्र
लेखनी निर्मितां पूर्व ब्रह्यणा परमेष्ठिना |
लोकानां च हितार्थाय तस्माताम पूजयाम्ह्यम||
पुस्तके चर्चिता देवी , सर्व विद्यान्न्दा भवः |
मदगृहे धन-धान्यादि-समृद्धि कुरु सदा ||
लेखयै ते नमस्तेस्तु , लाभकत्रर्ये नमो नमः |
सर्व विद्या प्रकाशिन्ये , शुभदायै नमो नमः ||
अब परिवार के सभी सदस्य एक सफ़ेद कागज पर एप्पन (चावल का आंटा,हल्दी,घी, पानी )व रोली से स्वस्तिक बनायें |उसके नीचे पांच देवी देवतावों के नाम लिखें ,जैसे -श्री गणेश जी सहाय नमः ,श्री चित्रगुप्त जी सहाय नमः ,श्री सर्वदेवता सहाय नमः आदि |
इसके नीचे एक तरफ अपना नाम पता व दिनांक लिखें और दूसरी तरफ अपनी आय व्यय का विवरण दें ,इसके साथ ही अगले साल के लिए आवश्यक धन हेतु निवेदन करें |फिर अपने हस्ताक्षर करें |
इस कागज और अपनी कलम को हल्दी रोली अक्षत और मिठाई अर्पित कर पूजन करें |
अब श्री चित्रगुप्त जी का ध्यान करते हुए निम्न लिखित मंत्र का कम से कम ११ बार उच्चारण करें -
मसीभाजन संयुक्तश्चरसि त्वम् ! महीतले |
लेखनी कटिनीहस्त चित्रगुप्त नमोस्तुते ||
चित्रगुप्त ! मस्तुभ्यं लेखकाक्षरदायकं |
कायस्थजातिमासाद्य चित्रगुप्त ! नामोअस्तु
भीष्म पितामह ने पुलस्त्य मुनि से पूछा के हे महामुनि संसार में कायस्थ नाम से विख्यात मनुष्य किस वंश में उत्पन्न हुये हैं तथा किस वर्ण में कहे जाते हैं इसे में जानना चाहता हूँ | इस प्रकार के वचन कहकर भीष्म पितामह ने पुलस्त्य मुनि से इस पवित्र कथा को सुनने के इक्छा जाहिर की पुलस्त्य मुनि ने प्रसन्न होकर गंगा पुत्र भीष्म पितामह से कहा - हे गंगेय में कायस्थ उत्पत्ति की पवित्र कथा का वर्णन आपसे करता हूँ | जो इस जगत का पालन कर्ता है वही फिर नाश करेगा उस अब्यक्त शांत पुरुष लोक - पितामह ब्रम्हा ने जिस तरह पूर्व में इस संसार की कल्पना की है | वही वर्णन में कर रहा हूँ -
मुख से ब्राम्हण बाहु से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य, पैर से शूद्र, दो पाँव चार पाँव वाले पशु से लेकर समस्त सर्पादि जीवो का एक ही समय में चन्द्रमा, सूर्यादि ग्रहों को और बहुत से जीवो को उत्पन्न कर ब्रम्हा में सूर्य के समान तेजस्वी ज्येष्ठ पुत्र को बुलाकर कहा हे सुब्रत तुम यत्न पूर्वक इस जगत की रक्षा करो | सृष्टि का पालन करने के लिये ज्येष्ठ पुत्र को आज्ञा देकर ब्रम्हा ने एकाग्रचित होकर दस हजार सौ वर्ष की समाधि लगाई अंत में विश्रांत चित्त हुये तदउपरांत उस ब्रम्हा के शरीर से बड़ी भुजाओ वाले श्याम वर्ण, कमलवत शंक तुल्य गर्दन, चक्रवत तेजस्वी, अति बुद्धिमान हाथ में कलम-दवात लिये तेजस्वी, अतिसुन्दर विचित्रांग, स्थिर नेत्र वाले, एक पुरुष अव्यक्त जन्मा जो ब्रम्हा के शरीर से उत्पन्न हुआ है | भीष्म उस अव्यक्त पुरुष को नीचे ऊपर देखकर ब्रम्हा जी ने समाधि छोडकर पूछा हे पुरुषोत्तम हमारे सामने स्थित आप कौन हैं | ब्रम्हा का यह वचन सुनकर वह पुरुष बोला हे विधे में आप ही के शरीर से उत्पन्न हुआ हूँ इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं है | हे तात अब आप मेरा नाम करण करने योग्य हैं | सो करिये और मेरे योग्य कार्य भी कहिये | यह वाक्य सुनकर ब्रम्हा जी निज शरीर रज पुरुष से हंसकर प्रसन्न मुद्रा से बोले की मेरे शरीर से तुम उत्पन्न हुये हो इससे तुम्हारी कायस्थ संज्ञा है | और पृथ्वी पर चित्रगुप्त तुम्हारा नाम विख्यात होगा | हे वत्स धर्मराज की यमपुरी धर्माधर्म वितार के लिये तुम्हारा निश्चित निवास होगा | हे पुत्र अपने वर्ण में जो उचित धर्म है उसका विधि पूर्वक पालन करो और संतान उत्पन्न करो इस प्रकार ब्रम्हा जी भार युक्त वर को देकर अंतर्ध्यान हो गये श्री पुलस्त्य मुनि ने कहा है हे कुरूवंश के वृद्धि करने वाले भीष्म चित्रगुप्त से जो प्रजा उत्पन्न हुई है | उसका भी वर्णन करता हूँ सुनिये - चित्रगुप्त का प्रथम विवाह सूर्यनारायण के बड़े पुत्र श्राद्धादेव मुनि की कन्या नंदनी एरावती से हुआ इसके चार पुत्र उत्पन्न हुये प्रथम भानु जिनका नाम धर्मध्वज है जिसने श्रीवास्तव कायस्थ वंश बेल को जन्म दिया | द्वितीय पुत्र मतिमान जिनका नाम समदयालु है | जिसने सक्सेना वंश बेल को जन्म दिया | तृतीय पुत्र चारु जिनका नाम युगन्धर है | जिसने माथुर कायस्थ वंश बेल को जन्म दिया | चतुर्थ पुत्र सुचारू जिनका नाम धर्मयुज है जिसने गौंड कायस्थ वंश को जन्म दिया |
चित्रगुप्त का दूसरा विवाह सुशर्मा ऋषि की कन्या शोभावती से हुआ इनसे आठ पुत्र हुये प्रथम पुत्र करुण जिनका नाम सुमति है जिसने कर्ण कायस्थ को जन्म दिया | द्वितीय पुत्र चित्रचारू जिनका नाम दामोदर है | जिसने निगम कायस्थ को जन्म दिया | तृतीय पुत्र जिनका नाम भानुप्रकाश है | जिसने भटनागर कायस्थ को जन्म दिया जिनका नाम युगन्धर है | अम्बष्ठ कायस्थ को जन्म दिया | पंचम पुत्र वीर्यवान जिनका नाम दीन दयालु है | जिसने आस्थाना कायस्थ को जन्म दिया शास्त्हम पुत्र जीतेंद्रीय जिनका नाम सदा नन्द है | जिसने कुलश्रेष्ट कायस्थ को जन्म दिया | अष्टम पुत्र विश्व्मानु जिनका नाम राघवराम है जिसने बाल्मीक कायस्थ को जन्म दिया है | हे महामुने चित्रगुप्त से उत्पन्न सभी पुत्र सभी शास्त्रों में निपुण उत्पन्न हुये धर्मा धर्म को जानने वाले महामुनि चित्रगुप्त ने सभी पुत्रो को पृथ्वी में भेजा और धर्म साधना के शिक्षा दी और कहा की तुम्हे देवताओं का पूजन पितरो का श्राद्ध तथा तर्पण, ब्राम्हणों का पालन पोषण और सदेव अभ्यागतो की यत्न पूर्वक श्रद्धा करनी चाहिये | हे पुत्र तीनो लोको के हित के लिये यत्न कर धर्म की कामना करके महर्षिमर्दिनी देवी का पूजन अवश्य करें | जो प्रकृति रूप माया चण्ड मुण्ड का नाश करने वाली तथा समस्त सिद्धियों को देने वाली है उसका पूजन करें जिसके प्रभाव से देवता लोग भी सिद्धियों को पाकर स्वर्ग लोक को गए और स्वर्ग के अधिकार को पाकर सदेव यज्ञ में भाग लेने वाले हुये | ऐसी देवी के लिये तुम सब उत्तम मिष्ठानादि समर्पण करो जिससे वह चण्डिका देवताओं की भाँती तुमको भी सिद्ध देने वाली होवे और वैष्णव धर्म का अवलंबन कर मेरे वाक्य का प्रति पालन करो सभी पुत्रो को आज्ञा देकर चित्रगुप्त स्वर्ग लोक चले गये स्वर्ग जाकर चित्रगुप्त धर्मराज के अधिकार में स्थित हुये | हे भीष्म इस प्रकार चित्रगुप्त की उत्पत्ति मैंने आपसे कही |
अब में उन लोगो का विचित्र इतिहास और चित्रगुप्त का जैसा प्रभाव उत्पन्न हुआ सो भी कहता हूँ सुनिये - श्री पुल्सत्य मुनि बोले की धर्माधर्म को जानते हुये नित्य पाप कर्म में रत पृथ्वी पर सौदास नामक राजा पैदा हुआ, उस पापी दुराचारी तथा धर्म कर्म से रहित राजा ने जिस प्रकार स्वर्ग में जाकर पुण्य के फल का भोग किया वह कथा सुना रहा हूँ | राजनीति को नहीं जानते हुये राजा ने अपने राज्य में ढिंडोरा पिटवा दिया की दान धर्म हवन श्राद्ध तर्पण अतिथियों का सत्कार जप नियम तथा तपस्या का साधन मेरे राज्य में कोई ना करे | देवी आदि की भक्ति में तत्पर वहां के निवासी ब्राम्हण लोग उसके राज्यों को छोड़ वहीँ से अन्य राज्यों में चले गये | जो रह गये यज्ञ हवन श्रद्धा तथा तर्पण कभी नहीं करते थे | हे गंगा पुत्र तबसे उसके राज्य में कोई भी यज्ञ हवन आदि पुण्य कर्म नहीं कर पता था | उस समय पुण्य उस राज्य से ही बाहर हो गया था | ब्राम्हण तथा अन्य वर्ण के लोग नाश करने लगे | अब आपको उस दुष्ट राजा का कर्म फल सुनाता हूँ हे भीष्म कार्तिक शुक्ल पक्ष की उत्तम तिथि द्वितीय को पवित्र होकर सभी कायस्थ चित्रगुप्त का पूजन करते थे | वे भक्ति भाव से परिपूर्ण होकर धूपदीपादि कर रहे थे देव योग से राजा सौदस भी घूमता हुआ वहां पंहुचा और पूजन देखकर पूछने लगा यह किसका पूजन कर रहे हो तब वे लोग बोले की राजन हम लोग चित्रगुप्त की शुभ पूजा कर रहे हैं | यह सुनकर राजा सौदस ने कहा की में भी चित्रगुप्त की पूजा करूँगा यह कहकर सौदस ने विधि पूर्वक स्नानादिकर मन से चित्रगुप्त की पूजा की, इस भक्तियुक्त पूजा करने से उसी क्षण राजा सौदस पाप रहित होकर स्वर्ग चला गया इस प्रकार चित्रगुप्त का प्रभावशाली इतिहास मैंने आपसे कहा | अब हे तृप श्रेष्ठ और क्या सुनने की आपकी इक्छा है | यह सुनकर भीष्म पितामह ने महर्षि पुलस्त्य मुनि से कहा हे विपेन्द्र किस विधि से वहां उस राजा सौदस ने चित्रगुप्त का पूजन किया जिसके प्रभाव से हे मुनि राजा सौदस स्वर्ग लोक को चला गया | श्री पुलस्त्य मुनि जी बोले - हे भीष्म चित्रगुप्त के पूजन कि संपूर्ण विधि में आप से कह रहा हूँ घृत से बने निवेध, ऋतुफल, चन्दन, पुष्प, रीप तथा अनेक प्रकार के निवेध, रेशमी और विचित्र वस्त्र से मेरी, शंख मृदंग, डिमडिम अनेक बाजे का भक्ति भाव से पतिपूर्ण होकर पूजन करें | हे विद्वान नवीन कलश लाकर जल से पतिपूर्ण करें उस पर शक्कर भरा कटोरा रखें और यतनपूर्वक पूजन कर ब्राम्हण को दान देवें | पूजन का मंत्र भी इस प्रकार पढ़े - दवात कलम और हाथ में खल्ली लेकर पृथ्वी में घूमने वाले हे चित्रगुप्त आपको नमस्कार हे चित्रगुप्त आप कायस्थ जाती में उत्पन्न होकर लेखकों को अक्षर प्रदान करते हैं | जिसको आपने लिखने की जीविका दी है | आप उनका पालन करते हैं | इसलिये मुझे भी शांति दीजिए | हे राजेन्द्र कुरूवंश को बढाने वाले हे भीष्म इन मंत्रो के संकल्प पूर्वक चित्रगुप्त का पूजन करना चाहिये | इस प्रकार राजा सौदस ने भक्ति भाव से पूजन कर निजराज्य का शाशन करता हुआ कुछ ही समय में मृत्यु को प्राप्त हुआ हे भारत यमदूत राजा सौदस को भयानक यमलोक में ले गये | चित्रगुप्त ने यमराज से पूछा की यह दुराचारी पाप कर्मरत सौदस राजा है | जिसने अपनी प्रजा से पापकर्म करवाया है | इस प्रकार धर्मराज से पूछे गये धर्माधर्म को जानने वाले महामुनि चित्रगुप्त जी हंसकर उस राजा के लिये धर्म विपाक युक्त शुभ वचन बोले हे धर्मराज
यह राजा यद्दपि पाप कर्म करने वाला पृथ्वी में प्रसिद्ध है | और में आपकी प्रसन्नता से पृथ्वी में पूज्य हूँ हे स्वामिन आपने ही मुझे वह वर दिया है | आपका सदेव कल्याण हो आपको नमस्कार है | हे देव आप भली भाँती जानते है और मेरी भी मति है की यह राजा पापी है तब भी इस राजा ने भक्ति भाव से मेरी पूजा की है इससे में इससे प्रसन्न हूँ | हे इष्टदेव इस कारण यह राजा बैकुंठ लोक को जाए | चित्रगुप्त का यह वचन सुनकर यमराज ने राजा सौदस का बैकुंठ जाने की आज्ञा दी और राजा सौदस बैकुंठ लोक को चला गया श्री पुल्सत्य मुनि जी ने कहा हे भीष्म जो कोई सामान्य पुरुष या कायस्थ चित्रगुप्त जी की पूजा करेगा वह भी पाप से छूटकर परमगति को प्राप्त करेगा | हे गंगेय आप भी सर्व विधि से चित्रगुप्त की पूजा करिये | जिसकी पूजा करने से हे राजेन्द्र आप भी दुर्लभ लोक को प्राप्त करेंगे | पुलस्त्य मुनि के वचन सुनकर भीष्म जी ने भक्ति मन से चित्रगुप्त जी की पूजा की | चित्रगुप्त की दिव्य कथा को जो श्रेष्ठ मनुष्य भक्ति मन से सुनेगे वे मनुष्य समस्त व्याधियों से छूटकर दीर्घायु होंगे और मरने पर जहाँ तपस्वी लोग जाते है | एसे विष्णु लोक को जायेंगे |
अब सभी सदस्य श्री चित्रगुप्त जी की आरती गावें |
इसके पश्चात् ख़ुशी पूर्वक श्री चित्रगुप्त जी महराज और श्री गणेश जी महाराज से अपने और अपने लोगों के लिए मंगल आशीर्वाद प्राप्त करते हुए शीश झुकाएं एवं प्रसाद का वितरण करें |
पूजा स्थान को साफ़ कर एक चौकी पर कपड़ा विछा कर श्री चित्रगुप्त जी का फोटो स्थापित करें यदि चित्र उपलब्ध न हो तो कलश को प्रतीक मान कर चित्रगुप्त जी को स्थापित करें
दीपक जला कर गणपति जी को चन्दन ,हल्दी,रोली अक्षत ,दूब ,पुष्प व धूप अर्पित कर पूजा अर्चना करें |
श्री चित्रगुप्त जी को भी चन्दन ,हल्दी,रोली अक्षत ,पुष्प व धूप अर्पित कर पूजा अर्चना करें |
फल ,मिठाई और विशेष रूप से इस दिन के लिए बनाया गया पंचामृत (दूध ,घी कुचला अदरक ,गुड़ और गंगाजल )और पान सुपारी का भोग लगायें |
इसके बाद परिवार के सभी सदस्य अपनी किताब,कलम,दवात आदि की पूजा करें और चित्रगुप्त जी के समक्ष रक्खें |
अब परिवार के सभी सदस्य एक सफ़ेद कागज पर एप्पन (चावल का आंटा,हल्दी,घी, पानी )व रोली से स्वस्तिक बनायें |उसके नीचे पांच देवी देवतावों के नाम लिखें ,जैसे -श्री गणेश जी सहाय नमः ,श्री चित्रगुप्त जी सहाय नमः ,श्री सर्वदेवता सहाय नमः आदि |
इसके नीचे एक तरफ अपना नाम पता व दिनांक लिखें और दूसरी तरफ अपनी आय व्यय का विवरण दें ,इसके साथ ही अगले साल के लिए आवश्यक धन हेतु निवेदन करें |फिर अपने हस्ताक्षर करें |
इस कागज और अपनी कलम को हल्दी रोली अक्षत और मिठाई अर्पित कर पूजन करें |
अब श्री चित्रगुप्त जी का ध्यान करते हुए निम्न लिखित मंत्र का कम से कम ११ बार उच्चारण करें -
मसीभाजन संयुक्तश्चरसि त्वम् ! महीतले |
लेखनी कटिनीहस्त चित्रगुप्त नमोस्तुते ||
चित्रगुप्त ! मस्तुभ्यं लेखकाक्षरदायकं |
कायस्थजातिमासाद्य चित्रगुप्त ! नामोअस्तुते ||
अब सभी सदस्य श्री चित्रगुप्त जी की आरती गावें |
इसके पश्चात् ख़ुशी पूर्वक श्री चित्रगुप्त जी महराज और श्री गणेश जी महाराज से अपने और अपने लोगों के लिए मंगल आशीर्वाद प्राप्त करते हुए शीश झुकाएं एवं प्रसाद का वितरण करें |
श्री चित्रगुप्त जी की आरती -
जय चित्रगुप्त यमेश तव ,शरणागतम ,शरणागतम|
जय पूज्य पद पद्मेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
जय देव देव दयानिधे ,जय दीनबंधु कृपानिधे |
कर्मेश तव धर्मेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
जय चित्र अवतारी प्रभो ,जय लेखनीधारी विभो |
जय श्याम तन चित्रेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
पुरुषादि भगवत् अंश जय ,कायस्थ कुल अवतंश जय |
जय शक्ति बुद्धि विशेष तव शरणागतम ,शरणागतम||
जय विज्ञ मंत्री धर्म के ,ज्ञाता शुभाशुभ कर्म के |
जय शांतिमय न्यायेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
तव नाथ नाम प्रताप से ,छूट जाएँ भय त्रय ताप से |
हों दूर सर्व क्लेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
हों दीन अनुरागी हरि, चाहें दया दृष्टि तेरी |
कीजै कृपा करुणेश तव शरणागतम ,शरणागतम||
वृहद् पूजन विधि -
इस विशेष पर्व पर श्री चित्रगुप्त जी महाराज एवं धर्मराज के पूजन से पहले पूजा स्थल पर कलश स्थापना (वरुण पूजन कर) वरुण देवता का आवाहन करें | फिर गणेश अम्बिका का पूजन कर उनका आवाहन करें | तत्पश्चात ईशान कोण में वेदी बनाकर नवग्रह की स्थापना कर आवाहन करें | इसके पश्चात् दवात,कलम,पत्र-पूजन एवं तलवार की स्थापना कर नीचे दी गयी विधि से पूजन करें |
पूजन एवं हवन सामग्री -
धूप, दीप, चन्दन, लाल फूल, हल्दी, रोली, अक्षत, दही, दूब, गंगाजल, घी, कपूर, कलम ( बिना चिरी हुई ), दवात, कागज, पान, सुपारी, गुड़, पांच फल, पांच मिठाई, पांच मेवा, लाई, चूड़ा, धान का लावा, हवन सामग्री एवं हवन के लिए लकड़ी आदि |
सामग्री पर पवित्र जल छिड़कते हुए प्रभु का स्मरण करें |
नमस्तेस्तु चित्रगुप्ते, यमपुरी सुरपूजिते |
लेखनी-मसिपात्र, हस्ते, चित्रगुप्त नमोस्तुते ||
स्वस्तिवाचन -
ॐ गणना त्वां गणपति हवामहे, प्रियाणां त्वां प्रियेपत्र हवामहे निधीनां त्वां निधिपते हवामहे वसो मम आहमजानि गर्भधामा त्वमजासि गर्भधम |
ॐ गणपत्यादि पंचदेवा नवग्रहाः इन्द्रादि दिग्पाला दुर्गादि महादेव्यः इहा गच्छत स्वकीयाम् पूजां ग्रहीत भगवतः चित्रगुप्त देवस्य पूजमं विघ्नरहित कुरूत |
ध्यान -
तच्छरी रान्महाबाहुः श्याम कमल लोचनः कम्वु ग्रीवोगूढ शिरः पूर्ण चन्द्र निभाननः ||
काल दण्डोस्तवोवसो हस्ते लेखनी पत्र संयुतः | निःमत्य दर्शनेतस्थौ ब्रह्मणोत्वयक्त जन्मनः ||
लेखनी खडगहस्ते च- मसि भाजन पुस्तकः | कायस्थ कुल उत्पन्न चित्रगुप्त नमो नमः ||
मसी भाजन संयुक्तश्चरोसि त्वं महीतले | लेखनी कठिन हस्ते चित्रगुप्त नमोस्तुते ||
चित्रगुप्त नमस्तुभ्यं लेखकाक्षर दायक | कायस्थ जाति मासाद्य चित्रगुप्त मनोस्तुते ||
योषात्वया लेखनस्य जीविकायेन निर्मित | तेषा च पालको यस्भात्रतः शान्ति प्रयच्छ मे ||
आवाहन-
हे!चित्रगुप्त जी मैं आपका आवाहन करता हूँ |
ॐ आगच्छ भगवन्देव स्थाने चात्र स्थिरौ भव | यावत्पूजं करिष्यामि तावत्वं सान्निधौ भव |
ॐ भगवन्तं श्री चित्रगुप्त आवाहयामि स्थापयामि ||
आसन-
ॐ इदमासनं समर्पयामि |
भगवते चित्रगुप्त देवाय नमः ||
पाद्य-
ॐ पादयोः पाद्यं समर्पयामि |
भगवते चित्रगुप्त देवाय नमः ||
आचमन-
ॐ मुखे आचमनीयं समर्पयामि |
भगवते चित्रगुप्ताय नमः ||
स्नान-
ॐ स्नानार्तः जलं समर्पयामि |
भगवते श्री चित्रगुप्ताय नमः ||
वस्त्र-
ॐ पवित्रों वस्त्रं समर्पयामि |
भगवते श्री चित्रगुप्त देवाय नमः ||
पुष्प-
ॐ पुष्पमालां च समर्पयामि |
भगवते श्री चित्रगुप्तदेवाय नमः ||
धूप-
ॐ धूपं माधापयामी |
भगवते श्री चित्रगुप्तदेवादीप-
ॐ दीपं दर्शयामि |
भगवते श्री चित्रगुप्त देवाय नमः II
नैवेद्य
ॐ नैवेद्यं समर्पयामि |
भगवते श्री चित्रगुप्त देवाय नमः ||
ताम्बूल-दक्षिणा
ॐ ताम्बूलं समर्पयामि
ॐ दक्षिणा समर्पयामि
भगवते श्री चित्रगुप्त देवाय नमः ||
दवात -लेखनी मंत्र
लेखनी निर्मितां पूर्व ब्रह्यणा परमेष्ठिना |
लोकानां च हितार्थाय तस्माताम पूजयाम्ह्यम||
पुस्तके चर्चिता देवी , सर्व विद्यान्न्दा भवः |
मदगृहे धन-धान्यादि-समृद्धि कुरु सदा ||
लेखयै ते नमस्तेस्तु , लाभकत्रर्ये नमो नमः |
सर्व विद्या प्रकाशिन्ये , शुभदायै नमो नमः ||
अब परिवार के सभी सदस्य एक सफ़ेद कागज पर एप्पन (चावल का आंटा,हल्दी,घी, पानी )व रोली से स्वस्तिक बनायें |उसके नीचे पांच देवी देवतावों के नाम लिखें ,जैसे -श्री गणेश जी सहाय नमः ,श्री चित्रगुप्त जी सहाय नमः ,श्री सर्वदेवता सहाय नमः आदि |
इसके नीचे एक तरफ अपना नाम पता व दिनांक लिखें और दूसरी तरफ अपनी आय व्यय का विवरण दें ,इसके साथ ही अगले साल के लिए आवश्यक धन हेतु निवेदन करें |फिर अपने हस्ताक्षर करें |
इस कागज और अपनी कलम को हल्दी रोली अक्षत और मिठाई अर्पित कर पूजन करें |
अब श्री चित्रगुप्त जी का ध्यान करते हुए निम्न लिखित मंत्र का कम से कम ११ बार उच्चारण करें -
मसीभाजन संयुक्तश्चरसि त्वम् ! महीतले |
लेखनी कटिनीहस्त चित्रगुप्त नमोस्तुते ||
चित्रगुप्त ! मस्तुभ्यं लेखकाक्षरदायकं |
कायस्थजातिमासाद्य चित्रगुप्त ! नामोअस्तु
भीष्म पितामह ने पुलस्त्य मुनि से पूछा के हे महामुनि संसार में कायस्थ नाम से विख्यात मनुष्य किस वंश में उत्पन्न हुये हैं तथा किस वर्ण में कहे जाते हैं इसे में जानना चाहता हूँ | इस प्रकार के वचन कहकर भीष्म पितामह ने पुलस्त्य मुनि से इस पवित्र कथा को सुनने के इक्छा जाहिर की पुलस्त्य मुनि ने प्रसन्न होकर गंगा पुत्र भीष्म पितामह से कहा - हे गंगेय में कायस्थ उत्पत्ति की पवित्र कथा का वर्णन आपसे करता हूँ | जो इस जगत का पालन कर्ता है वही फिर नाश करेगा उस अब्यक्त शांत पुरुष लोक - पितामह ब्रम्हा ने जिस तरह पूर्व में इस संसार की कल्पना की है | वही वर्णन में कर रहा हूँ -
मुख से ब्राम्हण बाहु से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य, पैर से शूद्र, दो पाँव चार पाँव वाले पशु से लेकर समस्त सर्पादि जीवो का एक ही समय में चन्द्रमा, सूर्यादि ग्रहों को और बहुत से जीवो को उत्पन्न कर ब्रम्हा में सूर्य के समान तेजस्वी ज्येष्ठ पुत्र को बुलाकर कहा हे सुब्रत तुम यत्न पूर्वक इस जगत की रक्षा करो | सृष्टि का पालन करने के लिये ज्येष्ठ पुत्र को आज्ञा देकर ब्रम्हा ने एकाग्रचित होकर दस हजार सौ वर्ष की समाधि लगाई अंत में विश्रांत चित्त हुये तदउपरांत उस ब्रम्हा के शरीर से बड़ी भुजाओ वाले श्याम वर्ण, कमलवत शंक तुल्य गर्दन, चक्रवत तेजस्वी, अति बुद्धिमान हाथ में कलम-दवात लिये तेजस्वी, अतिसुन्दर विचित्रांग, स्थिर नेत्र वाले, एक पुरुष अव्यक्त जन्मा जो ब्रम्हा के शरीर से उत्पन्न हुआ है | भीष्म उस अव्यक्त पुरुष को नीचे ऊपर देखकर ब्रम्हा जी ने समाधि छोडकर पूछा हे पुरुषोत्तम हमारे सामने स्थित आप कौन हैं | ब्रम्हा का यह वचन सुनकर वह पुरुष बोला हे विधे में आप ही के शरीर से उत्पन्न हुआ हूँ इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं है | हे तात अब आप मेरा नाम करण करने योग्य हैं | सो करिये और मेरे योग्य कार्य भी कहिये | यह वाक्य सुनकर ब्रम्हा जी निज शरीर रज पुरुष से हंसकर प्रसन्न मुद्रा से बोले की मेरे शरीर से तुम उत्पन्न हुये हो इससे तुम्हारी कायस्थ संज्ञा है | और पृथ्वी पर चित्रगुप्त तुम्हारा नाम विख्यात होगा | हे वत्स धर्मराज की यमपुरी धर्माधर्म वितार के लिये तुम्हारा निश्चित निवास होगा | हे पुत्र अपने वर्ण में जो उचित धर्म है उसका विधि पूर्वक पालन करो और संतान उत्पन्न करो इस प्रकार ब्रम्हा जी भार युक्त वर को देकर अंतर्ध्यान हो गये श्री पुलस्त्य मुनि ने कहा है हे कुरूवंश के वृद्धि करने वाले भीष्म चित्रगुप्त से जो प्रजा उत्पन्न हुई है | उसका भी वर्णन करता हूँ सुनिये - चित्रगुप्त का प्रथम विवाह सूर्यनारायण के बड़े पुत्र श्राद्धादेव मुनि की कन्या नंदनी एरावती से हुआ इसके चार पुत्र उत्पन्न हुये प्रथम भानु जिनका नाम धर्मध्वज है जिसने श्रीवास्तव कायस्थ वंश बेल को जन्म दिया | द्वितीय पुत्र मतिमान जिनका नाम समदयालु है | जिसने सक्सेना वंश बेल को जन्म दिया | तृतीय पुत्र चारु जिनका नाम युगन्धर है | जिसने माथुर कायस्थ वंश बेल को जन्म दिया | चतुर्थ पुत्र सुचारू जिनका नाम धर्मयुज है जिसने गौंड कायस्थ वंश को जन्म दिया |
चित्रगुप्त का दूसरा विवाह सुशर्मा ऋषि की कन्या शोभावती से हुआ इनसे आठ पुत्र हुये प्रथम पुत्र करुण जिनका नाम सुमति है जिसने कर्ण कायस्थ को जन्म दिया | द्वितीय पुत्र चित्रचारू जिनका नाम दामोदर है | जिसने निगम कायस्थ को जन्म दिया | तृतीय पुत्र जिनका नाम भानुप्रकाश है | जिसने भटनागर कायस्थ को जन्म दिया जिनका नाम युगन्धर है | अम्बष्ठ कायस्थ को जन्म दिया | पंचम पुत्र वीर्यवान जिनका नाम दीन दयालु है | जिसने आस्थाना कायस्थ को जन्म दिया शास्त्हम पुत्र जीतेंद्रीय जिनका नाम सदा नन्द है | जिसने कुलश्रेष्ट कायस्थ को जन्म दिया | अष्टम पुत्र विश्व्मानु जिनका नाम राघवराम है जिसने बाल्मीक कायस्थ को जन्म दिया है | हे महामुने चित्रगुप्त से उत्पन्न सभी पुत्र सभी शास्त्रों में निपुण उत्पन्न हुये धर्मा धर्म को जानने वाले महामुनि चित्रगुप्त ने सभी पुत्रो को पृथ्वी में भेजा और धर्म साधना के शिक्षा दी और कहा की तुम्हे देवताओं का पूजन पितरो का श्राद्ध तथा तर्पण, ब्राम्हणों का पालन पोषण और सदेव अभ्यागतो की यत्न पूर्वक श्रद्धा करनी चाहिये | हे पुत्र तीनो लोको के हित के लिये यत्न कर धर्म की कामना करके महर्षिमर्दिनी देवी का पूजन अवश्य करें | जो प्रकृति रूप माया चण्ड मुण्ड का नाश करने वाली तथा समस्त सिद्धियों को देने वाली है उसका पूजन करें जिसके प्रभाव से देवता लोग भी सिद्धियों को पाकर स्वर्ग लोक को गए और स्वर्ग के अधिकार को पाकर सदेव यज्ञ में भाग लेने वाले हुये | ऐसी देवी के लिये तुम सब उत्तम मिष्ठानादि समर्पण करो जिससे वह चण्डिका देवताओं की भाँती तुमको भी सिद्ध देने वाली होवे और वैष्णव धर्म का अवलंबन कर मेरे वाक्य का प्रति पालन करो सभी पुत्रो को आज्ञा देकर चित्रगुप्त स्वर्ग लोक चले गये स्वर्ग जाकर चित्रगुप्त धर्मराज के अधिकार में स्थित हुये | हे भीष्म इस प्रकार चित्रगुप्त की उत्पत्ति मैंने आपसे कही |
अब में उन लोगो का विचित्र इतिहास और चित्रगुप्त का जैसा प्रभाव उत्पन्न हुआ सो भी कहता हूँ सुनिये - श्री पुल्सत्य मुनि बोले की धर्माधर्म को जानते हुये नित्य पाप कर्म में रत पृथ्वी पर सौदास नामक राजा पैदा हुआ, उस पापी दुराचारी तथा धर्म कर्म से रहित राजा ने जिस प्रकार स्वर्ग में जाकर पुण्य के फल का भोग किया वह कथा सुना रहा हूँ | राजनीति को नहीं जानते हुये राजा ने अपने राज्य में ढिंडोरा पिटवा दिया की दान धर्म हवन श्राद्ध तर्पण अतिथियों का सत्कार जप नियम तथा तपस्या का साधन मेरे राज्य में कोई ना करे | देवी आदि की भक्ति में तत्पर वहां के निवासी ब्राम्हण लोग उसके राज्यों को छोड़ वहीँ से अन्य राज्यों में चले गये | जो रह गये यज्ञ हवन श्रद्धा तथा तर्पण कभी नहीं करते थे | हे गंगा पुत्र तबसे उसके राज्य में कोई भी यज्ञ हवन आदि पुण्य कर्म नहीं कर पता था | उस समय पुण्य उस राज्य से ही बाहर हो गया था | ब्राम्हण तथा अन्य वर्ण के लोग नाश करने लगे | अब आपको उस दुष्ट राजा का कर्म फल सुनाता हूँ हे भीष्म कार्तिक शुक्ल पक्ष की उत्तम तिथि द्वितीय को पवित्र होकर सभी कायस्थ चित्रगुप्त का पूजन करते थे | वे भक्ति भाव से परिपूर्ण होकर धूपदीपादि कर रहे थे देव योग से राजा सौदस भी घूमता हुआ वहां पंहुचा और पूजन देखकर पूछने लगा यह किसका पूजन कर रहे हो तब वे लोग बोले की राजन हम लोग चित्रगुप्त की शुभ पूजा कर रहे हैं | यह सुनकर राजा सौदस ने कहा की में भी चित्रगुप्त की पूजा करूँगा यह कहकर सौदस ने विधि पूर्वक स्नानादिकर मन से चित्रगुप्त की पूजा की, इस भक्तियुक्त पूजा करने से उसी क्षण राजा सौदस पाप रहित होकर स्वर्ग चला गया इस प्रकार चित्रगुप्त का प्रभावशाली इतिहास मैंने आपसे कहा | अब हे तृप श्रेष्ठ और क्या सुनने की आपकी इक्छा है | यह सुनकर भीष्म पितामह ने महर्षि पुलस्त्य मुनि से कहा हे विपेन्द्र किस विधि से वहां उस राजा सौदस ने चित्रगुप्त का पूजन किया जिसके प्रभाव से हे मुनि राजा सौदस स्वर्ग लोक को चला गया | श्री पुलस्त्य मुनि जी बोले - हे भीष्म चित्रगुप्त के पूजन कि संपूर्ण विधि में आप से कह रहा हूँ घृत से बने निवेध, ऋतुफल, चन्दन, पुष्प, रीप तथा अनेक प्रकार के निवेध, रेशमी और विचित्र वस्त्र से मेरी, शंख मृदंग, डिमडिम अनेक बाजे का भक्ति भाव से पतिपूर्ण होकर पूजन करें | हे विद्वान नवीन कलश लाकर जल से पतिपूर्ण करें उस पर शक्कर भरा कटोरा रखें और यतनपूर्वक पूजन कर ब्राम्हण को दान देवें | पूजन का मंत्र भी इस प्रकार पढ़े - दवात कलम और हाथ में खल्ली लेकर पृथ्वी में घूमने वाले हे चित्रगुप्त आपको नमस्कार हे चित्रगुप्त आप कायस्थ जाती में उत्पन्न होकर लेखकों को अक्षर प्रदान करते हैं | जिसको आपने लिखने की जीविका दी है | आप उनका पालन करते हैं | इसलिये मुझे भी शांति दीजिए | हे राजेन्द्र कुरूवंश को बढाने वाले हे भीष्म इन मंत्रो के संकल्प पूर्वक चित्रगुप्त का पूजन करना चाहिये | इस प्रकार राजा सौदस ने भक्ति भाव से पूजन कर निजराज्य का शाशन करता हुआ कुछ ही समय में मृत्यु को प्राप्त हुआ हे भारत यमदूत राजा सौदस को भयानक यमलोक में ले गये | चित्रगुप्त ने यमराज से पूछा की यह दुराचारी पाप कर्मरत सौदस राजा है | जिसने अपनी प्रजा से पापकर्म करवाया है | इस प्रकार धर्मराज से पूछे गये धर्माधर्म को जानने वाले महामुनि चित्रगुप्त जी हंसकर उस राजा के लिये धर्म विपाक युक्त शुभ वचन बोले हे धर्मराज
यह राजा यद्दपि पाप कर्म करने वाला पृथ्वी में प्रसिद्ध है | और में आपकी प्रसन्नता से पृथ्वी में पूज्य हूँ हे स्वामिन आपने ही मुझे वह वर दिया है | आपका सदेव कल्याण हो आपको नमस्कार है | हे देव आप भली भाँती जानते है और मेरी भी मति है की यह राजा पापी है तब भी इस राजा ने भक्ति भाव से मेरी पूजा की है इससे में इससे प्रसन्न हूँ | हे इष्टदेव इस कारण यह राजा बैकुंठ लोक को जाए | चित्रगुप्त का यह वचन सुनकर यमराज ने राजा सौदस का बैकुंठ जाने की आज्ञा दी और राजा सौदस बैकुंठ लोक को चला गया श्री पुल्सत्य मुनि जी ने कहा हे भीष्म जो कोई सामान्य पुरुष या कायस्थ चित्रगुप्त जी की पूजा करेगा वह भी पाप से छूटकर परमगति को प्राप्त करेगा | हे गंगेय आप भी सर्व विधि से चित्रगुप्त की पूजा करिये | जिसकी पूजा करने से हे राजेन्द्र आप भी दुर्लभ लोक को प्राप्त करेंगे | पुलस्त्य मुनि के वचन सुनकर भीष्म जी ने भक्ति मन से चित्रगुप्त जी की पूजा की | चित्रगुप्त की दिव्य कथा को जो श्रेष्ठ मनुष्य भक्ति मन से सुनेगे वे मनुष्य समस्त व्याधियों से छूटकर दीर्घायु होंगे और मरने पर जहाँ तपस्वी लोग जाते है | एसे विष्णु लोक को जायेंगे |
अब सभी सदस्य श्री चित्रगुप्त जी की आरती गावें |
इसके पश्चात् ख़ुशी पूर्वक श्री चित्रगुप्त जी महराज और श्री गणेश जी महाराज से अपने और अपने लोगों के लिए मंगल आशीर्वाद प्राप्त करते हुए शीश झुकाएं एवं प्रसाद का वितरण करें |
Thursday, 11 July 2019
खुश रहिए मस्त रहिए
💐 *खुश रहिए मस्त रहिए*💐 👍👍
🌾🍁🌿🌾🍁🌿🌾🍁🌿
😊: *इस जीवन की चादर में*
*सांसों के ताने बाने हैं*'
*दुख की थोड़ी सी सलवट है*
*सुख के कुछ फूल सुहाने हैं*.
*क्यों सोचे आगे क्या होगा*,
*अब कल के कौन ठिकाने हैं*,
☝ *ऊपर बैठा वो बाजीगर* ,
*जाने क्या मन में ठाने है*
*चाहे जितना भी जतन करे*
*भरने का दामन तारों से*,
*झोली में वो ही आएँगे*,
*जो तेरे नाम के दाने है*.""
🙏 *मीठा मीठा नमस्कार* 🙏
💐🌹🌿🍁🌾🌹🌹🌿🍁🌾💐
🌺🌺🙏🏻🙏🏻🙏🏻🌺🌺
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😊: *इस जीवन की चादर में*
*सांसों के ताने बाने हैं*'
*दुख की थोड़ी सी सलवट है*
*सुख के कुछ फूल सुहाने हैं*.
*क्यों सोचे आगे क्या होगा*,
*अब कल के कौन ठिकाने हैं*,
☝ *ऊपर बैठा वो बाजीगर* ,
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*चाहे जितना भी जतन करे*
*भरने का दामन तारों से*,
*झोली में वो ही आएँगे*,
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🙏 *मीठा मीठा नमस्कार* 🙏
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Tuesday, 7 May 2019
जो बीत गई सो बात गई
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई
मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई
हरिवंश राय बच्चन
जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई
मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई
हरिवंश राय बच्चन
Saturday, 27 April 2019
Saturday, 28 July 2018
Tuesday, 10 May 2016
कायस्थों का इतिहास | ।। Kayastha Khabar ।।
कायस्थों का स्त्रोत श्री चित्रगुप्तजी महाराज को माना जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्माजी ने चार वर्णो को बनाया ( ब्राह्मण ,क्षत्रीय , वैश्य , शूद्र ) तब यम जी ने उनसे मानवों का विवरण रखने में सहायता मांगी। फिर ब्रह्माजी ११००० वर्षों के लिये ध्यानसाधना मे लीन हो गये और जब उन्होने आँखे खोली तो देखा कि " आजानुभुज करवाल पुस्तक कर कलम मसिभाजनम" अर्थात एक पुरुष को अपने सामने कलम,दवात, पुस्तक तथा कमर मे तलवार बाँधे पाया । तब ब्रह्मा जी ने कहा कि "हे पुरुष तुम कौन हो, तब वह पुरुष बोला मैं आपके चित्त में गुप्त रूप से निवास कर रहा था, अब आप मेरा नामकरण करें और मेरे लिए जो भी दायित्व हो मुझे सौपें,तब ब्रह्माजी बोले जैसा कि तुम मेरे चित्र (शरीर) मे गुप्त (विलीन) थे इसलिये तुम्हे चित्रगुप्त के नाम से जाना जाएगा। और तुम्हारा कार्य होगा प्रेत्यक प्राणी की काया में गुप्तरूप से निवास करते हुए उनके द्वारा किये गए सत्कर्म और अपकर्म का लेखा रखना और तदानुसार सही न्याय कर उपहार और दंड की व्यवस्था करना। चूंकि तुम प्रत्येक प्राणी की काया में गुप्तरूप से निवास करोगे इसलिये तुम्हे और तुम्हारी संतानो को कायस्थ भी कहा जाएगा ।
"श्री चित्रगुप्त जी को महाशक्तिमान क्षत्रीय के नाम से सम्बोधित किया गया है । इनकी दो शादियाँ हुईं, पहली पत्नी सूर्यदक्षिणा/नंदनी जो ब्राह्मण कन्या थी, इनसे 4 पुत्र हुए जो भानू, विभानू, विश्वभानू और वीर्यभानू कहलाए। दूसरी पत्नी एरावती/शोभावति नागवन्शी क्षत्रिय कन्या थी, इनसे 8 पुत्र हुए जो चारु, चितचारु, मतिभान, सुचारु, चारुण, हिमवान, चित्र,और अतिन्द्रिय कहलाए।
1.श्री चारू (माथुर)- वह गुरु मथुरे के शिष्य थे | उनका राशि नाम धुरंधर था और उनका विवाह देवी पंकजाक्षी से हुआ | वह देवी दुर्गा की आराधना करते थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चारू को मथुरा क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था| उनके वंशज माथुर नाम से जाने गाये |उन्होंने राक्षसों (जोकि वेद में विश्वास नहीं रखते थे ) को हराकर मथुरा में राज्य स्थापित किया | इसके पश्चात् उनहोंने आर्यावर्त के अन्य हिस्सों में भी अपने राज्य का विस्तार किया | माथुरों ने मथुरा पर राज्य करने वाले सूर्यवंशी राजाओं जैसे इक्ष्वाकु, रघु, दशरथ और राम के दरबार में भी कई पद ग्रहण किये | माथुर 3 वर्गों में विभाजित हैं यथा देहलवी,खचौली एवं गुजरात के कच्छी | उनके बीच 84 अल हैं| कुछ अल इस प्रकार हैं- कटारिया, सहरिया, ककरानिया, दवारिया,दिल्वारिया, तावाकले, राजौरिया, नाग, गलगोटिया, सर्वारिया,रानोरिया इत्यादि| इटावा के मदनलाल तिवारी द्वारा लिखित मदन कोश के अनुसार माथुरों ने पांड्या राज्य की स्थापना की जो की आज के समय में मदुरै, त्रिनिवेल्ली जैसे क्षेत्रों में फैला था| माथुरों के दूत रोम के ऑगस्टस कैसर के दरबार में भी गए थे |
2.श्री सुचारू (गौड)- वह गुरु वशिष्ठ के शिष्य थे और उनका राशि नाम धर्मदत्त था | वह देवी शाकम्बरी की आराधना करते थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री सुचारू को गौड़ क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था | श्री सुचारू का विवाह नागराज वासुकी की पुत्री देवी मंधिया से हुआ | गौड़ 5 वर्गों में विभाजित हैं : 1. खरे 2. दुसरे 3. बंगाली 4. देहलवी 5. वदनयुनि | गौड़ कायस्थ को 32 अल में बांटा गया है |गौड़ कायस्थों में महाभारत के भगदत्त और कलिंग के रुद्रदत्त प्रसिद्द हैं |
3.श्री चितराक्ष (भटनागर) - वह गुरू भट के शिष्य थे |उनका विवाह देवी भद्रकालिनी से हुआ था | वह देवी जयंती की अराधना करते थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चित्राक्ष को भट देश और मालवा में भट नदी के तट पर राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था | उन्होंने चित्तौड़ एवं चित्रकूट की स्थापना की और वहीं बस गए | उनके वंशज भटनागर के नाम से जाने गए | भटनागर 84 अल में विभाजित हैं | कुछ अल इस प्रकार हैं- दासनिया, भतनिया, कुचानिया, गुजरिया,बहलिवाल, महिवाल, सम्भाल्वेद, बरसानिया, कन्मौजिया इत्यादि| भटनागर उत्तर भारत में कायस्थों के बीच एक आम उपनाम है |
4 श्री मतिमान (सक्सेना)- माता शोभावती (इरावती) के तेजस्वी पुत्र का विवाह देवी कोकलेश से हुआ | वे देवी शाकम्भरी की पूजा करते थे | चित्रगुप्त जी ने श्री मतिमान को शक् इलाके में राज्य स्थापित करने भेजा | उनके पुत्र एक महान योद्धा थे और उन्होंने आधुनिक काल के कान्धार और यूरेशिया भूखंडों पर अपना राज्य स्थापित किया | चूंकि वह शक् थे और शक् साम्राज्य से थे तथा उनकी मित्रता सेन साम्राज्य से थी, तो उनके वंशज शकसेन या सकसेन कहलाये| आधुनिक इरान का एक भाग उनके राज्य का हिस्सा था| आज वे कन्नौज, पीलीभीत, बदायूं, फर्रुखाबाद, इटाह,इटावाह, मैनपुरी, और अलीगढ में पाए जाते
हैं| सक्सेना 'खरे' और 'दूसर' में विभाजित हैं और इस समुदाय में 106 अल हैं |कुछ अल इस प्रकार हैं-
जोहरी, हजेला, अधोलिया, रायजादा, कोदेसिया, कानूनगो,बरतरिया, बिसारिया, प्रधान, कम्थानिया, दरबारी, रावत, सहरिया,दलेला, सोंरेक्षा, कमोजिया, अगोचिया, सिन्हा, मोरिया, इत्यादि|
5 श्री हिमवान (अम्बष्ट) - उनका राशि नाम सरंधर था और उनका विवाह देवी भुजंगाक्षी से हुआ | वह देवी अम्बा माता की अराधना करते थे | गिरनार और काठियवार के अम्बा-स्थान नामक क्षेत्र में बसने के कारण उनका नाम अम्बष्ट पड़ा | श्री हिमवान की पांच दिव्य संतानें हुईं : श्री नागसेन , श्री गयासेन, श्री गयादत्त, श्री रतनमूल और श्री देवधर | ये पाँचों पुत्र विभिन्न स्थानों में जाकर बसे और इन स्थानों पर अपने वंश को आगे बढ़ाया | इनका विभाजन : नागसेन २४ अल , गयासेन ३५ अल, गयादत्त ८५ अल,रतनमूल २५ अल, देवधर २१ अल में है | अंततः वह पंजाब में जाकर बसे जहाँ उनकी पराजय सिकंदर के सेनापति और उसके बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के हाथों हुई| अम्बष्ट कायस्थ बिजातीय विवाह की परंपरा का पालन करते हैं और इसके लिए "खास घर" प्रणाली का उपयोग करते हैं | इन घरों के नाम उपनाम के रूप में भी इस्तेमाल किये जाते हैं | ये "खास घर"(जिनसे मगध राज्य के उन गाँवों का नाम पता चलता है जहाँ मौर्यकाल में तक्षशिला से विस्थापित होने के उपरान्त अम्बष्ट आकर बसे थे) | इनमें से कुछ घरों के नाम
हैं- भीलवार, दुमरवे, बधियार, भरथुआर, निमइयार, जमुआर,कतरयार पर्वतियार, मंदिलवार, मैजोरवार, रुखइयार, मलदहियार,नंदकुलियार, गहिलवार, गयावार, बरियार, बरतियार, राजगृहार,देढ़गवे, कोचगवे, चारगवे, विरनवे, संदवार, पंचबरे, सकलदिहार,करपट्ने, पनपट्ने, हरघवे, महथा, जयपुरियार ...आदि|
6. श्री चारुण (कर्ण) - उनका राशि नाम दामोदर था एवं उनका विवाह देवी कोकलसुता से हुआ | वह देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे और वैष्णव थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चारूण को कर्ण क्षेत्र (आधुनिक कर्नाटक) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था | उनके वंशज समय के साथ उत्तरी राज्यों में प्रवासित हुए और आज नेपाल, उड़ीसा एवं बिहार में पाए जाते हैं | उनकी बिहार की शाखा दो भागों में विभाजित है : 'गयावाल कर्ण' – जो गया में बसे और 'मैथिल कर्ण' जो मिथिला में जाकर बसे | इनमें दास, दत्त, देव, कण्ठ, निधि,मल्लिक, लाभ, चौधरी, रंग आदि पदवी प्रचलित है| मैथिल कर्ण कायस्थों की एक विशेषता उनकी पंजी पद्धति है | पंजी वंशावली रिकॉर्ड की एक प्रणाली है | कर्ण 360 अल में विभाजित हैं | इस विशाल संख्या का कारण वह कर्ण परिवार हैं जिन्हों ने कई चरणों में दक्षिण भारत से उत्तर की ओर पलायन किया | इस समुदाय का महाभारत के कर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है |
7. श्री चित्रचारू (निगम) - उनका राशि नाम सुमंत था और उनका विवाह अशगंधमति से हुआ | वह देवी दुर्गा की अराधना करते थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री चित्रचारू को महाकोशल और निगम क्षेत्र(सरयू नदी के तट पर) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा | उनके वंशज वेदों और शास्त्रों की विधियों में पारंगत थे जिससे उनका नाम निगम पड़ा |आज के समय में कानपुर, फतेहपुर, हमीरपुर, बंदा, जलाओं,महोबा में रहते हैं | वह 43 अल में विभाजित हैं | कुछ अल इस प्रकार हैं- कानूनगो, अकबरपुर, अकबराबादी, घताम्पुरी,चौधरी, कानूनगो बाधा, कानूनगो जयपुर, मुंशी इत्यादि|
8.श्री अतिन्द्रिय (कुलश्रेष्ठ)- उनका राशि नाम सदानंद है और उन्हों ने देवी मंजुभाषिणी से विवाह किया | वह देवी लक्ष्मी की आराधना करते हैं | महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री अतिन्द्रिय (जितेंद्रिय) को कन्नौज क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था| श्री अतियेंद्रिय चित्रगुप्त जी की बारह संतानों में से अधिक धर्मनिष्ठ और सन्यासी प्रवृत्ति वाली संतानों में से थे | उन्हें 'धर्मात्मा' और 'पंडित' नाम से जाना गया और स्वभाव से धुनी थे | उनके वंशज कुलश्रेष्ठ नाम से जाने गए |आधुनिक काल में वे मथुरा, आगरा, फर्रूखाबाद, इटाह, इटावाह और मैनपुरी में पाए जाते हैं | कुछ कुलश्रेष्ठ जो की माता नंदिनी के वंश से हैं, नंदीगांव - बंगाल में पाए जाते हैं |
9. श्रीभानु (श्रीवास्तव) - उनका राशि नाम धर्मध्वज था | चित्रगुप्त जी ने श्री श्रीभानु को श्रीवास (श्रीनगर) और कान्धार के इलाके में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था| उनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री पद्मिनी से हुआ | उस विवाह से श्री देवदत्त और श्री घनश्याम नामक दो दिव्य पुत्रों की उत्पत्ति हुई | श्री देवदत्त को कश्मीर का एवं श्री घनश्याम को सिन्धु नदी के तट का राज्य मिला | श्रीवास्तव 2 वर्गों में विभाजित हैं यथा खर एवं दूसर| कुछ अल इस प्रकार हैं - वर्मा, सिन्हा, अघोरी, पडे, पांडिया,रायजादा, कानूनगो, जगधारी, प्रधान, बोहर, रजा सुरजपुरा,तनद्वा, वैद्य, बरवारिया, चौधरी, रजा संडीला, देवगन इत्यादि|
10. श्री विभानु (सूर्यध्व्ज)- उनका राशि नाम श्यामसुंदर था | उनका विवाह देवी मालती से हुआ | महाराज चित्रगुप्त ने श्री विभानु को काश्मीर के उत्तर क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा | चूंकि उनकी माता दक्षिणा सूर्यदेव की पुत्री थीं,तो उनके वंशज सूर्यदेव का चिन्ह अपनी पताका पर लगाये और सूर्यध्व्ज नाम से जाने गए | अंततः वह मगध में आकर बसे|
11. श्री विश्वभानु (वाल्मिक) - उनका राशि नाम दीनदयाल था और वह देवी शाकम्भरी की आराधना करते
थे | महाराज चित्रगुप्त जी ने उनको चित्रकूट और नर्मदा के समीप वाल्मीकि क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था | श्री विश्वभानु का विवाह नागकन्या देवी बिम्ववती से हुआ | यह ज्ञात है की उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा नर्मदा नदी के तट पर तपस्या करते हुए बिताया | इस तपस्या के समय उनका पूर्ण शरीर वाल्मीकि नामक लता से ढका हुआ था | उनके वंशज वाल्मीकि नाम से जाने गए और वल्लभपंथी बने | उनके पुत्र श्री चंद्रकांत गुजरात में जाकर बसे तथा अन्य पुत्र अपने परिवारों के साथ उत्तर भारत में गंगा और हिमालय के समीप प्रवासित हुए | आज वह गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं | गुजरात में उनको "वल्लभी कायस्थ" भी कहा जाता है |
12. श्री वीर्यभानु (अष्ठाना) - उनका राशि नाम माधवराव था और उन्हीं ने देवी सिंघध्वनि से विवाह किया |
वे देवी शाकम्भरी की पूजा किया करते थे| महाराज चित्रगुप्त जी ने श्री वीर्यभानु को आधिस्थान में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा | उनके वंशज अष्ठाना नाम से जाने गए और रामनगर- वाराणसी के महाराज ने उन्हें अपने आठ रत्नों में स्थान दिया | आज अष्ठाना उत्तर प्रदेश के कई जिले और बिहार के सारन, सिवान , चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी,दरभंगा और भागलपुर क्षेत्रों में रहते हैं | मध्य प्रदेश में भी उनकी संख्या ध्यान रखने योग्य है | वह ५ अल में विभाजित हैं |
Friday, 16 December 2011
JIVAN PRABHU TERE HATH ME {Dedicated CHRISTMASS}
Jivan ye rangmunch mera malik ke hath me, wo mujhe khilaye bna ke khiladi ya rehjau ek anadi , sub malik ke hath me, kru kya, kiya kya jivan hai katputli,dor to hai us malik ke hath me , dana pani kaha ho aur kese sab wo taye karta hai bus aakar mere man me aadesh de deta hai, meri sas meri ruh aur uski khusi malik tere hath me, me na janu teri puja na janu tu hai kha , bus itna me janu iss sristi ko tu hi prabhu chala rha, tu chahta hai jo karwane wahi hota hai iss jag me , mallik sab tere hath me, me bhed hu wo tera jo apne jhund se gya bhatak mujhko ban charwaha tu ab rasta de dikha , ya de mujhe aadesh tu jo chahe jisse bhala ho samaj ka prabhu sab tere hath me , prem bhi , jwani bhi , chahat aur bhudapa bhi rup hai anubhav ke tere, swas bhi samir bhi jharoke hai tere , hum sab katputliya ye jivan rangmunch tera tu jab tak chahe khele isse aur phir tod kar phek de malik sab tere hath me , mena chaha kora jivan , mena chaha sara aasman, chaha chahat nam jo soi dur prai , ab itni hi guzarish hai prabhu le lo mujhe tu apne saran me bna kar das apna tu khel iss rangmunch me.
Friday, 9 December 2011
Wednesday, 7 December 2011
DOSTI
एक दोस्त एक दोस्त के लिए क्या होता है | शायद ये अहसास सिर्फ दूरियों में होता है | राधा भी रोती है अपने कृष्ण के लिए पर कृष्ण तो सुदामा के लिए रोता है |
Monday, 5 December 2011
A story of poor child
में उन दिनों 3rd इयर में पढ़ता था और मेरे घर एक गरीब महिला कम करने आती थी ! ताकि वो अपने परिवार का भरण पोसन कर सके| ये घटना मेरे दिल को छू गया | ये कहानी उस गरीब माँ की है जिसका तिन साल का बेटा उससे खिलोने की जिद करता है | जब एक गरीब औरत का ३ साल का बेटा उससे कहता है माँ खरीद दे न रेल अऊ पटरी ओके चलाबू में इहा| तो वह गरीब कहती है बेटा तू त अब पढ़े जबे त ट्रेन से कैसे खेलबे तो उ लड़का बोलता है जाबो टाइम मिली त नई खेलब माँ खरीद दे न | माँ -बेटा जबो पैसा हो जाई न तो खरीद देब , बेटा -नई माँ खरीद दे न रेल अऊ पटरी बार बार | माँ - चुप रह नई तो मरबो , बेटा - माँ खरीद दे न रेल अऊ पटरी | उसकी माँ ने मुझसे कहा देखत हो इ लड़का कुछु चीज ला जिदियात जात है | मेरे पास अपने कम के ८० रुपये थे वो मेने उस बच्चे को दे दिए |
Saturday, 3 December 2011
Q1)क्या होती है वैक्सीन ? Q2)कोवैक्सीन और कोविड शील्ड में आखिर क्या है अंतर ?
क्या होती है वैक्सीन ?
वैक्सीन या टीका जैविक पदार्थों से बना द्रव्य है। वैक्सीन शरीर के अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी कि Immunity को बढ़ाकर शरीर में उत्पन्न होने वाले सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने का काम करती है। वैक्सीन न केवल बीमारी को कंट्रोल करने में मदद करता है बल्कि जिन लोगों में वायरस का संक्रमण अभी नहीं हुआ है उनमें भी इम्युनिटी का विकास कर बीमारी को फैलने से रोकने का काम करता है। वैक्सीन का अर्थ होता है हमारी बॉडी में जो वायरस एक्टिव है उसके रोक्थाम के लिए काम करना । असल में यह हमारी बॉडी में एंटीबोडी को जन्म देने का कारण बनता है ।
भारत की वैक्सीन कोवैक्सीन और कोविड शील्ड में आखिर क्या है अंतर ?
कोविशील्ड :- कोविशिल्ड वैक्सीन वायरस - एडेनोवायरस का उपयोग करके विकसित किया गया है - जो कि चिम्पांजी के बीच आम सर्दी के संक्रमण का कारण बनता है। इसकी आनुवंशिक सामग्री SARS-CoV-2 कोरोनावायरस के स्पाइक प्रोटीन के समान है। स्पाइक प्रोटीन SARS-CoV-2 का हिस्सा है, जिसके उपयोग से वायरस मानव शरीर की कोशिका में प्रवेश करता है। कोविशिल्ड वैक्सीन को एडेनोवायरस के कमजोर संस्करण का उपयोग करके विकसित किया गया है।
कोवैक्सीन :- कोवाक्सिन वैक्सीन को मृत कोरोनावायरस का उपयोग करके विकसित किया गया है - जिसे चिकित्सा भाषा में "निष्क्रिय" टीका कहा जाता है। निष्क्रिय अवस्था के तहत, वायरस इंजेक्शन लगाने के बाद किसी व्यक्ति के शरीर के अंदर लोगों को संक्रमित करने या उसकी नकल करने में सक्षम नहीं है। लेकिन वैक्सीन का एक शॉट प्रतिरक्षा प्रणाली को वास्तविक वायरस को पहचानने के लिए तैयार करता है और संक्रमण होने पर उससे लड़ता है ।
Friday, 2 December 2011
ma
usko na dekha kabhi par iski jarurat kya hogi , a ma teri surat se achhi bhagwan ki surat kya hogi
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